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Woman Power, Everyday

Praatibh Mishra’s poem speaks in the voice of women, demanding respect every day, in personal and public spaces.


मुझे नहीं चाहिए सम्मान जो
सिर्फ एक रोज के लिए तुम्हारी नज़रो में झलकता है,
या तो मुझे पूरा सम्मान दे दो,
वरना आज भी तुम अपनी नजरे फेर लो तो अच्छा होगा|

मुझे नहीं चाहिए वो सम्मान जो
सिर्फ हमारे रिश्ते की मर्यादा के कारण
तुम मुझे मजबूरी में देते हो |
या तो मुझे पूरा सम्मान दे दो, वरना आज भी तुम अपनी नजरे फेर लो तो अच्छा होगा|

क्यों, अपने ही घर में किसी की पर्सनल प्रॉपर्टी जैसा अहसास दिलाते हो
और सार्वजानिक स्थल पर सरकारी बस जैसा फील कराते हो,
व्यव्हार करना तुम्हे नहीं आता और व्यावहारिकता के मायने अक्सर जगह देखकर बदल जाते है|

शालीनता तो सिखाई गयी थी तुम्हे भी, पर क्यों घर तक ही सीमित रह गयी वो ?

मुझे नहीं चाहिए ऐसा सम्मान
जो घर की दीवारों तक सीमित है,
या तो घर के बाहर भी, सम्मान देना सीख लो
वरना घर के अन्दर भी करना भूल जाओ तो अच्छा होगा |

मुझे नहीं चाहिए सम्मान जो
सिर्फ एक रोज के लिए तुम्हारी नज़रो में झलकता है,
या तो मुझे पूरा सम्मान दे दो,
वरना आज भी तुम अपनी नजरे फेर लो तो अच्छा होगा|

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