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हिम्मत और नीयत


In the last week of August, PRIA program staff underwent a Training of Trainers (ToT) in Lucknow. What does it mean to undergo a ToT? How does it change the participant? It takes courage and determination, reflects Alok Pandey, who was a facilitator in the training, not only to undergo a ToT but to initiate change afterwards in our lives.


बचपन से लेकर अपने जीवन काल के अनेक पड़ावों पर मैंने हिम्मत और नीयत को लेकर अनेक कहानियाँ पढ़ी और सुनी थीं। कई बार इन शब्दों के विभिन्न प्रयोगों को लेकर मित्र-मंडलियों में जोरदार चर्चा भी हुई थी। लेकिन इन दो शब्दों का व्यक्तित्व के विकास में क्या योगदान हो सकता है, इसे करीब से समझने का मौका पिछले दिनों दिनांक 24 से 30 अगस्त 2017 के दौरान सहभागी शिक्षण केन्द्र, लखनऊ में ‘प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण’ कार्यक्रम में मिला।

प्रिया के सहयोग से सहभागी शिक्षण केन्द्र के द्वारा इस कार्यक्रम का आयोजन पिछले लगभग दो दशकों से लगातार किया जा रहा है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य समाज विकास के कामों के लिये लोगों को तैयार करना होता है जो समुदाय के लोगों के साथ मिलकर और उनकी भावनाओं तथा जरूरतों को समझते हुये उनकी क्षमताओं का विकास कर सके। इसी लिये इस कार्यक्रम में उन लोगों को शामिल होने का मौका मिलता है जिन्होंनें समुदाय के लोगों के साथ मिल कर पहले कुछ प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया हो। ‘प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण’ कार्यक्रम के माध्यम से समाज विकास के कामों में लगे लोगों में एक कार्यकर्ता और प्रशिक्षक के रूप में अलग-अलग दक्षताओं को विकसित करने का प्रयास किया जाता है। ऐसी दक्षतायें जिससे बदलाव के कामों के दौरान लोगों के समूह बनाने से लेकर उनका नेतृत्व करने और इस दौरान होने वाली विभिन्न प्रक्रियाओं जैसे समूह के लोगों के साथ संबंध बनाना, सामूहिक निर्णय को बढ़ावा देना, विवादों का निपटारा करना, इत्यादि जैसे कामों में दूसरों के भाव को समझने की क्षमता कार्यकर्ताओं में विकसित हो सके।

प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण’ कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा स्वयं को पहचानने का होता है। अपने ‘स्वये’ को पहचानने के लिये कार्यक्रम में भाग लेने वाले प्रत्येक प्रतिभागी को कुछ व्यक्तिगत और कुछ सामूहिक अभ्यास करने होते हैं। इन अभ्यासों का करने के लिये अलग-अलग पद्धतियों और विधाओं का उपयोग किया जाता है। यह इन पद्धतियों और विधाओं की खूबसूरती ही है जो प्रतिभागियों को एक विशेष परिस्थिति में बड़े ही रोचक पूर्ण तरीके से समूह कार्याें में भाग लेने के लिये प्रेरित करती हैं। इस दौरान प्रतिभागियों के द्वारा कुछ कार्य स्वभावतः किये जाते हैं जो उनके द्वारा ऐसी ही परिस्थितियों में अपने कार्य क्षेत्र में भी किये जाते हैं। यह पूरी प्रक्रिया प्रतिभागियों के ‘स्वयं’ को दिखाने और समझाने में उनकी मदद करते हैं। कई बार प्रतिभागियों को उनके द्वारा किये गये कार्याें को ही स्वीकार करना करना कठिन होता है।





लेकिन ‘प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण’ कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ही यह है कि यदि स्वीकार करने की हिम्मत और सुधार करने की नीयत हो तो व्यक्ति स्वयं में बदलाव ला सकता है। यह इस मान्यता को भी बल देता है कि समाज में बड़े बदलाव लाने से पहले खुद में छोटे-छोटे बदलाव लाना क्यों आवश्यक है। यह एक कठिन प्रक्रिया हो सकती है किन्तु असम्भव नहीं।

वैसे समाज में एक छोटा बदलाव लाना भी हिम्मत का ही काम है और इसके लिये कुछ अच्छा करने की नीयत का होना जस्री है।

 

 

 

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