कथनी और करनी में भेद

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  • इंग्लैंड के एक उभरते राजनीतिक नेता ने लेबर पार्टी के सम्मलेन में जोर-शोर से कामगारों की न्यूनतम मजदूरी बढाने की मांग करी. अगले ही दिन मीडिया में खबर आयी की वह अपने बिज़नस में कामगारों को न्यूनतम मजदूरी नहीं देते.
  • अमेरिका के एक सीनेटर ने सरकारी स्कूलों में गिरती हुई शिक्षा की स्थिति सुधारने की राष्ट्रपति से अपील करी. कुछ दिन बाद खबर आई की सीनेटर के अपने बच्चे महंगे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं.
  • साउथ अफ्रीका में एक बिजनेसमैन ने राजनीती में तेजी से एंट्री ली. उसने राष्ट्रीय गोष्ठी में महिलायों के सशक्तिकरण की ज़रुरत पर बात रखी. उसकी पत्नी ने उसके }kjk किये जा रहे यौन उत्पीडन की शिकायत मीडिया में की.

इन तीनो केसों में जनता ने इन नेताओं को रिजेक्ट कर दिया. इनकी नेतागिरी बंद.

पते की बात यह है की इन देशों की जनता अब कथनी और करनी के भेद को गंभीरता से देखने लगी है. इन देशों में अब ज्यादातर लोग कहो कुछ और करो कुछ और से तंग आ चुके हैं.

पर हमारे देश में? हमारे देश में तो कथनी और करनी में सभी का भेद ही चलता रहता है. स्कूल का मास्टर कहता है ईमानदारी से पढो और खुद पढ़ाने नहीं आता. घर में बाप मेहनत से पढाई करने के लिए चिल्लाता है और घर पर स्वयं लेटा रहता है, कोई घर का काम नहीं करता.

नेता लोग चिल्ला-चिल्ला कर देश सुधारने की अपील करते हैं; सफाई रखो, भगवान को याद रखो और करो (टेक्स)  की चोरी न करो – यह समझाते हैं. उनके अपने लोग चोरी करते हैं, गन्दगी फैलाते है और भगवान के नाम पर आम जनता को लूटते रहते हैं.

हमारे देश के लोग कथनी और करनी के इस भेद को अनदेखी क्यों करते हैं? हम क्यों ऐसे लोगों की बात सुनते हैं, उन्हें मानते हैं?

राजेश टंडन

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